सौर ऊर्जा से हाइड्रो तक भारत की बिजली व्यवस्था चीन के भरोसे

मोदी सरकार के 11 साल में चीन से आयात कम नहीं, दोगुना हुआ!

चीन से आयात 2014 से 2024 का ग्राफ़

पिछले एक दशक में भारत और चीन के रिश्तों में कई उतार-चढ़ाव देखने को मिले। गलवान घाटी की झड़पों से लेकर सीमा विवाद, ‘बॉयकॉट चाइना’ के नारे और स्वदेशी अपनाने की अपील,सब कुछ भारतीय राजनीति और मीडिया में गूंजा। मगर वास्तविकता यह है कि भारत की आर्थिक और औद्योगिक धुरी अब भी चीन से ही घूम रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने पिछले 11 वर्षों में कई बार राष्ट्रवाद की चादर ओढ़ने की कोशिश की, लेकिन जब आंकड़ों पर नज़र डालें तो यह साफ हो जाता है कि चीन के बिना भारत का विकास रुक जाएगा। खासकर ऊर्जा उत्पादन, ऊर्जा भंडारण, इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी जैसे क्षेत्रों में चीन की पकड़ इतनी मज़बूत है कि भारत विकल्प तलाशने के बावजूद निर्भर बना हुआ है।

आयात का बढ़ता ग्राफ़

2014 में जब मोदी सरकार सत्ता में आई थी, तब भारत का चीन से कुल आयात लगभग 54 अरब डॉलर था। 2024 तक यह आंकड़ा 101.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यानी 11 वर्षों में दोगुनी से भी अधिक वृद्धि। विशेष रूप से औद्योगिक वस्तुओं, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, मशीनरी और ऊर्जा संबंधी उपकरणों का आयात तेज़ी से बढ़ा है।

2009–10 में चीन का भारत के औद्योगिक आयात में हिस्सा लगभग 21% था। 2024 में यह बढ़कर लगभग 30% हो गया। यह बताता है कि सीमा पर तनाव और राष्ट्रवादी नारों के बावजूद वास्तविक आर्थिक परिदृश्य में चीन की भूमिका लगातार गहरी होती गई है।

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ऊर्जा उत्पादन में चीन के बिना काम नहीं

भारत अपनी बढ़ती आबादी और औद्योगिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए बिजली उत्पादन क्षमता तेज़ी से बढ़ा रहा है। मगर यहां भी चीन ही असली सप्लायर है।

1. सौर ऊर्जा संयंत्र

भारत की राष्ट्रीय सौर क्षमता 2024 में 80 गीगावॉट (GW) तक पहुंच चुकी है। लेकिन इसमें इस्तेमाल हुए मॉड्यूल और पैनलों का 80% से ज़्यादा हिस्सा चीन से आया है। 2024 में भारत ने चीन से 4.2 अरब डॉलर से अधिक के सोलर मॉड्यूल आयात किए। टॉप सप्लायरों में Sungrow, TBEA, Sineng, Solis और Huawei जैसी चीनी कंपनियां हावी रहीं।

वैश्विक स्तर पर 10 में से 9 सबसे बड़े सोलर इन्वर्टर निर्माता चीन से हैं। भारत में लगाए गए बड़े सोलर पार्क इन्हीं कंपनियों पर निर्भर हैं।

2. विद्युत उत्पादन मशीनरी

बिजलीघर बनाने के लिए ज़रूरी स्टीम टर्बाइन, हाइड्रो टर्बाइन, बॉयलर और सुपरक्रिटिकल तकनीक वाली मशीनरी चीन से बड़ी मात्रा में आयात की जाती है। 2024 में भारत ने चीन से 757 मिलियन डॉलर मूल्य के इलेक्ट्रिक मोटर और जेनरेटर, और 2.26 अरब डॉलर मूल्य के ट्रांसफॉर्मर व कन्वर्टर खरीदे।

3. ऊर्जा भंडारण (बैटरियाँ)

इलेक्ट्रिक वाहनों और नवीकरणीय ऊर्जा के भंडारण के लिए लिथियम-आयन बैटरियों की मांग तेज़ी से बढ़ रही है। चीन इस बाजार का बादशाह है। 2024 में भारत ने चीन से 2.9 अरब डॉलर मूल्य की बैटरियाँ खरीदीं। यहां तक कि भारत में बनने वाले EV (इलेक्ट्रिक वाहन) भी चीनी सेल्स और बैटरी पैक पर ही निर्भर हैं।

इलेक्ट्रॉनिक्स और संचार

भारत में हर हाथ में स्मार्टफोन और हर घर में LED टीवी के पीछे ज्यादातर चीनी कंपोनेंट्स हैं। 2024 में भारत ने चीन से 10.5 अरब डॉलर मूल्य के इंटीग्रेटेड सर्किट और माइक्रोचिप्स आयात किए। दूरसंचार उपकरणों का आयात लगभग 13 अरब डॉलर रहा, जिसमें Huawei और ZTE जैसी कंपनियों का बड़ा हिस्सा है। सेमीकंडक्टर डिवाइस और प्रिंटेड सर्किट बोर्ड्स का लगभग 70% चीन और हांगकांग से आता है।

राष्ट्रवाद बनाम हकीकत

मोदी सरकार ने बार-बार “आत्मनिर्भर भारत” और “मेक इन इंडिया” का नारा दिया। चीनी ऐप्स पर बैन लगाए गए, ‘वोकल फॉर लोकल’ मुहिम चली, और आयात पर ड्यूटी बढ़ाई गई। लेकिन सौर ऊर्जा मॉड्यूल्स पर 40% और सेल्स पर 25% बेसिक कस्टम ड्यूटी (BCD) लगाने के बावजूद भारतीय डेवलपर्स चीनी मॉड्यूल्स ही खरीदते रहे क्योंकि वे सस्ते और बेहतर हैं।

ALMM (Approved List of Models and Manufacturers) नीति लागू करने के बावजूद, बड़े प्रोजेक्ट्स को चीनी कंपनियों के बिना पूरा करना संभव नहीं हो पाया। भारतीय कंपनियां अभी भी तकनीकी और उत्पादन क्षमता के मामले में चीन से बहुत पीछे हैं।

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क्यों है चीन पर निर्भरता?

किफ़ायती दाम – चीनी कंपनियां बड़े पैमाने पर उत्पादन करती हैं और कीमतें बहुत कम रखती हैं।

तकनीकी बढ़त – सेमीकंडक्टर, बैटरी, सौर ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में चीन ने वैश्विक स्तर पर अग्रणी स्थान बना लिया है।

सप्लाई चेन नेटवर्क – चीन का इकोसिस्टम इतना विशाल है कि हर ज़रूरत का सामान वहीं से मिलता है।

भारतीय उत्पादन की सीमाएँ – भारत में अभी तक सेमीकंडक्टर फैब, बैटरी सेल मैन्युफैक्चरिंग और उच्च-स्तरीय मशीनरी का घरेलू उत्पादन पर्याप्त नहीं है।

भविष्य की राह

भारत ने कई योजनाएँ शुरू की हैं जिसमे PLI (Production Linked Incentive) स्कीम के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स और बैटरी उत्पादन को बढ़ावा, गुजरात में सेमीकंडक्टर फैब परियोजनाएँ एवं घरेलू सौर मॉड्यूल निर्माण क्षमता को बढ़ाने के प्रयास। लेकिन ये सब अभी शुरुआती चरण में हैं और अगले 5–10 वर्षों तक चीन की जगह लेने की संभावना कम है।

सार 

भारत में राजनीतिक भाषणों में भले ही “स्वदेशी” और “चीन मुक्त भारत” की गूंज सुनाई दे, पर सच्चाई यह है कि चीन के बिना भारत का काम नहीं चल सकता। ऊर्जा उत्पादन, ऊर्जा भंडारण, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी हर जगह चीन की गहरी पैठ है।

मोदी सरकार के 11 सालों में चीन से आयात घटने के बजाय बढ़ा है। यह दिखाता है कि राष्ट्रवाद के नारे और ज़मीनी आर्थिक सच्चाई में गहरी खाई है। अगर भारत को सच में आत्मनिर्भर बनना है, तो उसे सिर्फ नारे नहीं, बल्कि ठोस तकनीकी और औद्योगिक निवेश करने होंगे।

फ़िलहाल चीन से आयात भारत के लिए “विकल्प” नहीं बल्कि “ज़रूरत” है। ऊर्जा से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स तक, चीन की आपूर्ति के बिना भारत की विकास गाड़ी पटरी से उतर जाएगी। इसलिए, फिलहाल “चीन से आयात है ज़रूरी” और यही कटु सच्चाई है।

SOURCE-

Tata Power, Reuters.The Wall Street Journal Angel One.mint.NDTV ProfitThe Federal.

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