अडानी से टाटा तक: भारत की बड़ी निजी बिजली कंपनियाँ चीन पर निर्भर
आयात में दशकभर में 70% उछाल
भारत और चीन के रिश्ते पिछले एक दशक में राजनीतिक और सामरिक दृष्टि से भले ही तनावपूर्ण रहे हों, लेकिन आर्थिक और औद्योगिक स्तर पर स्थिति इसके ठीक उलट है। भारतीय राजनीति और मीडिया में अक्सर “चीन को सबक सिखाने” और “आत्मनिर्भर भारत” के नारे गूँजते हैं, मगर हकीकत यह है कि देश की सबसे बड़ी निजी बिजली कंपनियाँ अपने बिजली उत्पादन और विस्तार योजनाओं के लिए चीन पर बुरी तरह निर्भर हैं।
2014 से 2024 के बीच पाँच प्रमुख निजी बिजली कंपनियों अडानी पावर, टाटा पावर, जेएसडब्ल्यू एनर्जी, रिलायंस पावर और क्लीनमैक्स एनर्जी का चीन से आयात लगभग 70% से अधिक बढ़ गया है। यह वृद्धि केवल थर्मल मशीनरी तक सीमित नहीं है, बल्कि सौर ऊर्जा उपकरण, बैटरियाँ और ऊर्जा भंडारण तकनीक में भी साफ दिखती है।
आयात का दशकभर का ग्राफ़: 2014–2024
अडानी पावर: 2014 में $0.8 बिलियन का आयात → 2024 में $3 बिलियन तक।
टाटा पावर: $0.5 बिलियन → $1.9 बिलियन।
जेएसडब्ल्यू एनर्जी: $0.3 बिलियन → $1.2 बिलियन।
रिलायंस पावर: $0.4 बिलियन → $1.5 बिलियन।
क्लीनमैक्स एनर्जी: $0.1 बिलियन → $1.3 बिलियन।
कुल मिलाकर, इन पाँच कंपनियों का चीन से आयात 2014 में लगभग $2.1 बिलियन था, जो 2024 में बढ़कर $8.9 बिलियन हो गया।
तालिका: 2014 बनाम 2024 आयात (निजी कंपनियाँ, अनुमानित आंकड़े)
कंपनी | 2014 आयात ($B) | 2024 आयात ($B) | वृद्धि (%) |
---|---|---|---|
अडानी पावर | 0.8 | 3.0 | +275% |
टाटा पावर | 0.5 | 1.9 | +280% |
जेएसडब्ल्यू एनर्जी | 0.3 | 1.2 | +300% |
रिलायंस पावर | 0.4 | 1.5 | +275% |
क्लीनमैक्स एनर्जी | 0.1 | 1.3 | +1200% |
कुल | 2.1 | 8.9 | ~324% |
(नोट: आंकड़े अनुमानित हैं, लेकिन वास्तविक व्यापारिक रुझानों पर आधारित हैं।)
आयात का पैटर्न
अडानी पावर: सुपरक्रिटिकल बॉयलर, टर्बाइन और सौर ऊर्जा संयंत्रों के लिए $3.5 बिलियन का उपकरण पिछले दशक में चीन से खरीदा।
टाटा पावर: सोलर पैनल और इन्वर्टर पर निर्भरता सबसे अधिक। केवल 2023-24 में ही 80% सौर उपकरण चीन से आयात।
JSW एनर्जी: हाइड्रो और थर्मल परियोजनाओं के लिए चीनी टर्बाइन व कन्वर्टर आयात, मूल्य ~$1.2 बिलियन।
रिलायंस पावर: कोयला आधारित पावर प्लांट्स के लिए बॉयलर और टर्बाइन, साथ ही लिथियम-आयन बैटरियों पर बढ़ती निर्भरता।
क्लीनमैक्स एनर्जी: भारत के औद्योगिक सौर संयंत्रों में अग्रणी, इनके 70% मॉड्यूल्स चीन से आते हैं।
क्षेत्रवार निर्भरता: सौर, थर्मल और बैटरियाँ
भारत में बिजली उत्पादन में विविधीकरण तेजी से हो रहा है। लेकिन चाहे थर्मल पावर हो या ग्रीन एनर्जी—चीनी सामान हर जगह मौजूद है।
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सौर ऊर्जा (Solar Power)-भारत की कुल स्थापित सौर क्षमता 2024 में 80 GW से अधिक है। इसमें इस्तेमाल होने वाले 80% से अधिक सोलर मॉड्यूल और इन्वर्टर चीन से आयात किए गए।अडानी पावर और टाटा पावर जैसे दिग्गज अपने सौर पार्कों में Sungrow, Huawei, Sineng जैसी चीनी कंपनियों के इन्वर्टर इस्तेमाल करते हैं।
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थर्मल पावर (Thermal Power)-सुपरक्रिटिकल बॉयलर, टर्बाइन और जेनरेटर जैसी मशीनरी में चीन की कंपनियाँ मुख्य सप्लायर हैं। 2024 में अकेले थर्मल पावर उपकरणों का आयात $2.5 बिलियन रहा।
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ऊर्जा भंडारण और बैटरियाँ (Energy Storage & Batteries)- EV (इलेक्ट्रिक वाहन) और ग्रिड-स्केल बैटरी स्टोरेज की मांग बढ़ने के साथ, चीन से लिथियम-आयन बैटरी का आयात 2024 में $2.9 बिलियन तक पहुँच गया।क्लीनमैक्स एनर्जी और टाटा पावर की नई नवीकरणीय परियोजनाएँ चीनी बैटरी सेल्स पर निर्भर हैं।
क्यों बढ़ रही है निर्भरता?
किफायती दाम: चीनी उपकरण भारत की तुलना में 20–30% सस्ते हैं।
तकनीकी बढ़त: सोलर मॉड्यूल, बैटरी सेल और इन्वर्टर टेक्नोलॉजी में चीन वैश्विक नेता है।
स्केल और सप्लाई चेन: चीन का उत्पादन इकोसिस्टम इतना विशाल है कि तुरंत सप्लाई सुनिश्चित करता है।
घरेलू उत्पादन की कमी: भारत में अभी तक बड़े पैमाने पर सौर सेल, सेमीकंडक्टर और बैटरी निर्माण क्षमता विकसित नहीं हो सकी है।
सरकार के कदम और वास्तविकता
मोदी सरकार ने “आत्मनिर्भर भारत” और “मेक इन इंडिया” के तहत कई कदम उठाए हैं। सरकार ने सोलर मॉड्यूल्स पर 40% BCD (Basic Customs Duty) और सेल्स पर 25% ड्यूटी लगाई। ALMM (Approved List of Models and Manufacturers) नीति लागू की गई।बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण को बढ़ावा देने के लिए PLI स्कीम शुरू की गई।
लेकिन हकीकत यह है कि परियोजनाओं की लागत और समय सीमा देखते हुए कंपनियाँ अब भी चीनी मॉड्यूल्स और उपकरण खरीदना ज्यादा आसान समझती हैं। भारतीय निर्माता अभी तक चीनी गुणवत्ता और स्केल की बराबरी नहीं कर पाए।
विशेषज्ञों की राय
ऊर्जा विश्लेषकों का कहना है कि भारत अगले 5–7 वर्षों में भी चीन पर अपनी निर्भरता पूरी तरह कम नहीं कर पाएगा। सौर उपकरणों में चीन की पकड़ इतनी मजबूत है कि भारत की घरेलू फैक्ट्रियाँ फिलहाल इसकी बराबरी नहीं कर सकतीं। बैटरी निर्माण के लिए ज़रूरी लिथियम और कोबाल्ट की सप्लाई चेन भी चीन के हाथ में है।
सार
पिछले 10 वर्षों में भारत की सबसे बड़ी निजी बिजली कंपनियों ने चीन से आयात में कई गुना वृद्धि की है। यह केवल एक व्यापारिक प्रवृत्ति नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक आत्मनिर्भरता से जुड़ा सवाल है।
“अडानी से टाटा तक” सभी कंपनियाँ यह साबित करती हैं कि चीन भारत के लिए विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है। जब तक भारत घरेलू स्तर पर तकनीकी और औद्योगिक क्षमता विकसित नहीं करता, तब तक “चीन से आयात है ज़रूरी” ही सच्चाई बनी रहेगी।
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